वंदे मातरम् भी टाइम-टेबल में! 3 मिनट 10 सेकंड से न सेकंड कम, न ज्यादा

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ अब पूरी तरह standard operating procedure के तहत गूंजेगा। केंद्र सरकार ने एक नया प्रोटोकॉल जारी करते हुए साफ कर दिया है कि अब छह अंतरों वाला अधिकृत संस्करण ही हर तय सरकारी अवसर पर प्रस्तुत किया जाएगा — और वह भी पूरे 3 मिनट 10 सेकंड में।

मतलब अब न छोटा वर्ज़न, न मनपसंद कट-कॉपी। राष्ट्रगीत भी अब पूरे अनुशासन में।

क्यों आया यह नया नियम?

सरकार का कहना है कि अलग-अलग कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के random excerpts इस्तेमाल होने से प्रस्तुति में एकरूपता नहीं रह जाती थी। नया नियम यह सुनिश्चित करेगा कि सम्मान बना रहे। प्रोटोकॉल एक जैसा हो। राष्ट्रीय भावना में कोई कन्फ्यूजन न रहे।

अब वंदे मातरम् भी “पूरा सुनिए, स्किप नहीं” कैटेगरी में आ गया है।

किन कार्यक्रमों में अनिवार्य होगा यह संस्करण?

नए आदेश के मुताबिक यह नियम लागू होगा राष्ट्रीय ध्वज फहराने वाले कार्यक्रमों में। राष्ट्रपति की उपस्थिति वाले आयोजनों में। राष्ट्रपति के भाषण से पहले और बाद में। राष्ट्र के नाम संबोधन के दौरान। राज्यों में राज्यपाल के आधिकारिक कार्यक्रमों में। यानि VIP मूवमेंट हो या संविधानिक मंच टाइम और ट्यून दोनों फिक्स।

छह अंतरों में समाया भारत

वंदे मातरम् के छहों अंतरों में भारत को सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि सुजलाम्-सुफलाम् धरती, शक्ति और साहस की प्रतीक, विद्या और भक्ति की जननी करुणामयी मां के रूप में चित्रित किया गया है। यही वजह है कि सरकार इसे “पूरा” ही सुनवाना चाहती है — आधा नहीं।

इतिहास भी उतना ही मजबूत

  • रचना: बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय
  • वर्ष: 1875
  • प्रकाशित: बंगदर्शन और बाद में आनंदमठ (1882)
  • आज़ादी के आंदोलन में बना संघर्ष का गीत

वंदे मातरम्” का अर्थ — मां, मैं तुम्हें नमन करता हूँ — आज भी उतना ही असरदार है।

सरकार का संदेश क्या है?

सरकार मानती है कि तय प्रारूप में वंदे मातरम् का गायन राष्ट्रीय गौरव बढ़ाएगा संवैधानिक अनुशासन मजबूत करेगा और भावनाओं को protocol-friendly बनाए रखेगा। सीधे शब्दों में — भावना भी, नियम भी।

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